एक जमानेमे हम भी उसके आशिक हुवा करते थे
हमारे निंदोके रास्ते भी उसके ख्वाबोंसे होकर गुजरते थे
पता नही ऐसे क्यू होता था,
मगर निंद से पेहेले दो तीन खंटे, मे इसीमे जाया कर देता था
उसके बाद जाकर निंद लगी तो लगी,
नहीतो सुभे तक यही सिलसिले जारी होते थे...
एक जमानेमे हम भी उसके आशिक हुवा करते थे...
उसका वो अपने हातोसे, अपनी जुलफोंको टेहेलाना
उसके उस सफेद दुपट्टेका हवा मे लेहेराना
उसका शर्मांना , उसका घबराना
मुडके देखना और फिर देखके अनदेखा कर जाना
उसके इन अदाओंको हम हर दिन ताका करते थे...
एक जमानेमे हम भी उसके आशिक हुवा करते थे...
उसके मौजूदगिका ऐहेसास भी कूच अलगसाही लगता था
ख्वाबोंमेभी उसको देखनेको मुझे डरसाही लगता था
जब गुजरतीथी बगलसे तो एक आंधी सी लगती थी
धडकने तेज हो जाती थी और सांस जानबुजकर लेनी पडती थी
वो गुजर जाने के बाद भी हम कुच पल सदमे मे रेहेते थे...
एक जमानेमे हम भी उसके आशिक हुवा करते थे...
आज भी बारीश उसकी यादे लेके आती है
बुंदोंसे , हवाओंसे वो हमको छु जाती है
पुरानी यादे हम फिरसे जी लेते है
बारीश की खुशबू जी भर के पी लेते है
फिर हंस देते है खुदसेही , जैसे पेहेले हसा करते थे
एक जमानेमे हम भी उसके आशिक हुवा करते थे
हमारे निंदोके रास्ते भी उसके ख्वाबोसे होकर गुजरते थे
-तुषार