Saturday, 20 June 2020

सडक

हा ये वही सडक है,
जिसपर मे अकसर घुमता रेहेत हूं,
बिना वजह अकेले...

शायद इसका एक नशा सा हो गया है मुझे,
की तकलीफ होगि ये जानते हुवे भी,
ये पैर मुझे इसी सडक पे ले आते है...

क्यूकी इसी सडक पे,
वो आखों के कोनोसे मुझे देखती थी,
ताकी में ना देख सकू

इसी सडक पे,
वो छूठे वाले गुस्से से मुझे देखती थी,
क्योकी मेरे दोस्त उसे चिडते थे 

और हा ..इसी सडक पे,
उसने पेहेली बार मुझे मुस्कुराकर देखा था
हा इसी सडक पे

हा इसी सडक पे,
मे और मेरे दोस्त उसका पिछा करते थे
कभी वो पिछे देखती थी , तो कभी नही

सडक के एक मोड पे ,
वो मुडके अपने घरकी तरफ निकल जाती थी
मगर मैने उस मोड के आगे 
कभी उसका पिछा किया नही

मे डरता था की उसके मोहोल्ले वाले मुझे देखेंगे तो नही
मगर अब लगता है , की उस मोड के भी आगे,
पिछा करना चाहीये था तेरा
पिछेसेही भला देख तो पाता
तेरी लेहेराते हुवे झुल्फोंको कुछ देर और...

हा ये वही सडक है,
जिसपर मे अकसर घुमता रेहेत हूं,
बिना वजह अकेले...
                                  -तुषार

1 comment:

उमेद

अंधारलेली रात्र सारी, विस्कटलेल्या दिशा ह्या दाही चांदण्या न उरल्या दिशा दाखवाया, अन् कोणाचा आधार नाही... चालत आहे काळासंगे, चालता आता पायही...